जाने गणेश जी के जन्म, उनके सभी अवतार और उनकी कथाओं के बारे में!!

ganesh ji

गणेश जी की कथा

सद्गुरु: शिव एक तरह के घुमते-फिरते रहने वाले पति थे। वह लगातार कई-कई सालों तक घूमते रहते थे, वे कहीं भी चले जाते थे। उन दिनों कोई सेल फोन और ईमेल नहीं हुआ करते थे, इसलिए जब वह जाते थे तो पार्वती का उनके कोई संपर्क नहीं रहता था। और वह काफी अकेलापन महसूस करती थीं। साथ ही, शिव की प्रकृति को देखते हुए, उन्हें मानव मूल का नहीं, यक्ष स्वरूपी माना जाता था – इसलिए पार्वती उनके बच्चे को जन्म नहीं दे सकती थी।

तो अपने अकेलेपन और इच्छा के कारण और मातृत्व भाव की वजह से, उन्होंने एक शिशु को बनाने और उसमें प्राण फूँकने का फैसला किया। उन्होंने अपनी एक चीज़ ली, अपने शरीर पर लगे चंदन के लेप को तेल के साथ मिलाकर एक शिशु का रूप दिया और उसमें जीवन डाल दिया। यह भले ही दूर की कौड़ी लगे, लेकिन आजकल विज्ञान में भी इस तरह की चर्चा होती है। अगर कोई आपसे एक एपिथेलियल सेल ले ले, तो किसी दिन हम उससे आपका कुछ बना सकते हैं। पार्वती ने उसमें प्राण फूँक दिए और एक बच्चे ने जन्‍म ले लिया।

शिव ने गणेश का सिर क्यों काटा

कुछ साल बाद, जब वह लड़का करीब दस साल का था, तब शिव अपने गणों के साथ लौटे। पार्वती स्नान कर रही थीं और उन्होंने उस छोटे बच्चे से कहा, ‘ध्यान रखना कि कोई इस तरफ न आने पाए।’ लड़के ने कभी शिव को देखा नहीं था, तो जब वह आए, लड़के ने उन्हें रोक दिया। शिव दूसरे ही मूड में थे – रुकने के लिए तैयार नहीं थे – तो उन्होंने अपनी तलवार निकाली और लड़के का सिर काट दिया, फिर पार्वती के पास आए।

जब पार्वती ने उनके हाथ में खून लगी तलवार देखी, तो वह समझ गईं कि क्या हुआ। उन्होंने लड़के को सिर विहीन वहाँ पड़े देखा तो उनका गुस्सा भड़क गया। शिव ने उन्हें समझाने की कोशिश की, ‘कोई बात नहीं। वह तुम्हारा असली पुत्र नहीं है। आखिरकार तुमने उसे बनाया और मैंने नष्ट कर दिया। इसमें क्या परेशानी है?’ लेकिन वह सुनने के मूड में नहीं थीं।

गणेश के पास हाथी का सिर क्यों नहीं है

बात को सुलझाने के लिए, शिव ने अपने एक गण का सिर लिया और लड़के की धड़ पर लगा दिया। गणेश चतुर्थी वह दिन होता है, जब उनके सिर को दोबारा लगाया गया था। शिव ने गणों के सरदार का सिर लेकर इस लड़के पर लगाया था, इसलिए वह बोले, ‘अब से, तुम गणपति हो। तुम गणों के सरदार हो।’ बाद में जाकर, कैलेंडर कलाकार इस दूसरी तरह के प्राणी को नहीं समझ पाए और उन्होंने एक हाथी का चेहरा बना दिया। कथाओं में बताया जाता है कि कैसे गणों के अंगों में हड्डियाँ नहीं होती थीं। इस संस्कृति में, हड्डियों के बिना किसी अंग का अर्थ हाथी की सूँड़ से लगाया जाता है, इसलिए कलाकारों ने हाथी का सिर बना दिया। आपको मानसरोवर के किनारे कोई हाथी नहीं मिलेगा क्योंकि वह इलाका उनके लिए सही नहीं है। वहाँ एक हाथी के लायक हरियाली नहीं है। शिव हाथियों को काटने नहीं गए होंगे। इसलिए, गणेश के कई नाम हैं – गणेश, गणपति, विनायक – लेकिन उनका नाम गजपति नहीं है।

गण शिव के साथी थे। हम नहीं जानते कि वे कहाँ से आए थे, लेकिन आम तौर पर कहानियों में उन्हें ऐसे प्राणियों के रूप में दिखाया जाता है जो इस लोक के नहीं थे। उस जीवन की बनावट इस जीवन से बहुत अलग है, जिसे हम जानते हैं।

आजकल, आधुनिक बायोलॉजी साफ-साफ कहती है कि एक कोशिका वाले जानवर से जीवन के सभी जटिल रूपों और मनुष्य की रचना हुई। लेकिन जीवन की मूलभूत प्रकृति वही है – उसमें बदलाव नहीं हुआ है। वह सिर्फ और जटिल होती जाती है। लेकिन गणों के जीवन का बनावट हमारे जैसी नहीं थी। वे धरती पर नहीं बने थे। और उनके अंग बिना हड्डियों के थे।

 

अगर आप अपने शरीर को अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल करना चाहें, अगर आप आसन करते हैं, तो आप सोचते हैं कि काश आपके शरीर में हड्डियाँ न होतीं। मैंने 11 साल की उम्र से योग करना शुरू कर दिया था, इसलिए जब मैंने 25 साल की उम्र में हठयोग सिखाया, तो लोगों ने मुझे देखकर कहा, ‘अरे तुम्हारे शरीर में तो हड्डियाँ ही नहीं हैं। तुम हड्डी रहित हो।’ यह हर योगी का सपना होता है, कि एक दिन उसके अंगों में हड्डियाँ नहीं होंगे ताकि वह जो चाहे, वह आसन कर सके।

गणेश जी के साथ शुभ लाभ क्यों लिखा जाता है

हम किसी भी शुभ कार्य के शुरू करने पर  स्वास्तिक के साथ शुभ लाभ लिखते हैं। स्वास्तिक को गणेश जी का ही प्रतीक माना जाता है। स्वास्तिक के दाएं बाएं हम शुभ लाभ लिखते हैं। शुभ लाभ गणेश जी के पुत्रों के नाम है। जहां  शुभ होता है वहां लाभ होने लगता है और रिद्धि और सिद्धि हो जाती है। स्वास्तिक की अलग-अलग रेखाएं गणेश जी की पत्नी रिद्धि और सिद्धि को दर्शाती हैं।

गणेश जी के भक्त मोरया गोसावी की कथा

आपने गणेश चतुर्थी पर लोगों को गणपति बप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया! के जयकारे लगाते हुए सुना होगा। कहते हैं कि कई बार भगवान अपने प्रिय भक्तों के नाम से भी जाने जाते हैं। गणपति जी के साथ मोरया भी उनके प्रिय भक्त मोरया गोसावी के नाम से जुड़ गया। महाराष्ट्र के पुणे से लगभग 18 किलोमीटर दूर चिंचवाड़ क्षेत्र में हर कोई गणेश जी के भक्त मोरया के बारे में जानता है। जहां पर मोरया गोसावी ने गणेश जी के एक मंदिर की स्थापना की थी।

मोरया गोसावी गणेश जी के परम भक्त थे। उनको गणपति जी की भक्ति विरासत में अपने माता-पिता से प्राप्त हुई थी। उनके पिता का नाम वामन भट्ट और माता का नाम पार्वती बाई था। दोनों पति-पत्नी गणेश जी के भक्त थे।

 मोरया गोसावी जी भी गणेश जी के भक्त थे। ऐसा माना जाता है कि मोरया गोसावी जी हर वर्ष गणेश चतुर्थी को चिंचवाड़ से पैदल यात्रा करके वहां से 95 किलोमीटर दूर मयूरेश्वर मंदिर में श्री गणेश के दर्शन के लिए जाते थे। उनके बचपन से 117 वर्ष की आयु तक यह सिलसिला चलता रहा।

लेकिन वृद्धावस्था के कारण उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। एक दिन गणपति जी ने उनको स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि जब तुम प्रातः काल नदी पर स्नान करने जाओगे तो तुम्हें एक प्रतिमा मिलेगी।

अगले दिन जब वह स्नान करने गए तो उन्हें स्वप्न में जैसे स्वरुप के गणपति जी ने दर्शन दिए थे वैसी ही मूर्ति मिली। मोरया गोसावी जी ने उस मूर्ति को लेकर चिंचवाड़ में ही स्थापित कर दिया और उसकी पूजा अर्चना करने लगे।

समय के साथ चिंचवाड़ मंदिर की लोकप्रियता बढ़ने लगी और दूर-दूर से भक्त गणपति जी के दर्शन करने आने लगे। भक्त गणपति जी का दर्शन करने के पश्चात उनके प्रिय भक्त का आशीर्वाद लेते। ऐसा माना जाता है कि भक्त उन्हें गणपति मोरया कहते और वह अपने भक्तों को मंगलमूर्ति कहते।

 समय के साथ गणपति और उनके भक्त मोरया का नाम एक साथ पुकारा जाने लगा “गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया”।

गणेश जी के 8 अवतारों की कहानी

हिन्दू धर्म के अनुसार गणपति को सर्वप्रथम पूजे जाने वाले देवता की उपाधि प्रदान की गई है। किन्ही भी भगवान की पूजा करने से पहले श्री गणेश जी की पूजा करनी आवश्यक है, वरना वह पूजा असफल मानी जाती है। इसलिए प्रत्येक शुभ कार्य और त्यौहार में सर्वप्रथम गणपति जी की पूजा और आरती की जाती है, तत्पश्चात अन्य देवता की  पूजा करते है।

गणेश पुराण के अनुसार भगवान गणेश जी के अनेकों नाम है। कोई उन्हें गजानन कहता है तो कोई उन्हें विघ्नहर्ता, तो कोई लम्बोदराय । जितने भगवान गणेश के नाम है उतने ही इनके अवतार भी है। तो चलिए आपकों बताते है कि गणेश भगवान के कितने रूप है और किस कारण उन्होंने यह अवतार लिए।

  • वक्रतुंड

वक्रतुंड- भगवान गणेश का पहला अवतार वक्रतुंड अवतार माना जाता है। जब मत्सरासुर दैत्य ने घोर तपस्या कर भगवान शिव से वरदान के रूप में महाशक्तियों की प्राप्ति की,तब  भगवान शिव के वरदान देने के बाद पूरे संसार में अत्याचार करना शुरू कर दिया। इस अत्याचार में उस दैत्य के साथ उसके दोनों पुत्र सुन्दरप्रिय और विषयप्रिय भी शामिल थे। पूरे संसार का हाल-बेहाल देख देवता गण भगवान शिव की शरण में पहुंचे और मत्सरासुर और उसके पुत्रों से संसार को बचाने के लिए प्रार्थना करने लगे। तब भगवान शिव जी ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे भगवान गणेश जी का आह्वान करें। देवताओं की अराधना के बाद भगवान गणेश जी ने वक्रतुंड रूप धारण किया और दानव मत्सरासुर और उसके दोनों पुत्रों का संहार किया।

  • एकदंत

एकदंत– गणेश पुराण के अनुसार भगवान गणेश जी का दूसरा अवतार एकदंत है। भगवान गणेश का एकदंत का रूप धारण करने का कारण मद नामक राक्षस था। महर्षि च्यवन ने अपने तपोबल से एक मद नाम के दैत्य की रचना की। और मद राक्षस नें गुरू शुक्राचार्य से शिक्षा प्राप्त की। शुक्राचार्य ने उस राक्षस को प्रत्येक विधा में निपुण बनाया। पूरी शिक्षा प्राप्त करने के बाद उस मदासुर ने देवताओं को सताना शुरू कर दिया । इसके बाद देवताओं ने भगवान गणेश जी की शरण ली। इसके बाद भगवान गणेश ने एकदंत का स्वरूप धारण किया और मदासुर का वध कर देवताओं को मदासुर के आतंक से छुटकारा दिलाया।

  • महोदर

महोदर– ‘महोदर’ का अवतार धारण करने का कारण मोहासुर नामक असुर था। महोदर भगवान गणेश जी का तीसरा अवतार था। मोहासुर को भी शस्त्रों का ज्ञान दैत्य गुरू शुक्राचार्य ने ही प्रदान किया था। मोहासुर भी देवताओं की परेशानी का कारण था। इसलिए देवताओं ने भगवान गणेश से उससे मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। इसके बाद भगवान गणेश महोदर अवतार में प्रकृट हुए, जिनका स्वरूप बड़े पेट वाला था। और मूषक पर सवार होकर मोहासुर के नगर में उससे युद्ध करनें पहुंचें, तब मोहासुर दैत्य नें भगवान गणेश का इतना बड़ा महोदर स्वरूप देख कर भयभीत हो गए और बिना युद्ध करें भगवान गणेश जी को अपना इष्ट बना लिया।

  • गजानन

गजानन– गणेश पुराण के अनुसार भगवान गणेश का चौथा अवतार गजाजन है। धन के मालिक कुबरे से लोभासुर नाम के एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। वह लोभासुर दैत्य गुरू शुक्राचार्य के पास गया और उनके दिए गए निर्देश के अनुसार शिवजी की तपस्या की। भगवान शिव लोभासुर की भक्ति से प्रसन्न हुए, और निर्भय होने का वरदान दे दिया। उसके बाद लोभासुर सभी देवताओं से उनके लोक छीनकर उन्हें वहां से भगा दिया। इसके बाद सभी देवताएं अपनी परेशानी भगवान गणेश के पास लेकर गए। तब भगवान गणेश ने गजाजन रूप धारण किया और लोभासुर को पराजय कर दिया।

  • लम्बोदर

लम्बोदर– एक क्रोधासुर नाम के दैत्य ने ने सूर्यदेव की उपासना करके उनसे ब्रह्माण्ड पर विजय प्राप्ति का वरदान ले लिया। क्रोधासुर के इस वरदान के कारण तीनों लोक में हाहाकार मच गया। तब भगवान गणेश जी ने लम्बोदर रूप धारण कर उस क्रोधासुर के साथ युद्ध किया और पराजय कर दिया।

  • विकट

विकट– जब भगवान विष्णु ने जलंधर नामक राक्षस का संहार करने के लिए जंलधर की पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया, तब उस दौरान वृंदा ने एक कामासुर नाम के दैत्य को उत्पन्न किया। उस कामासुर दैत्य ने भगवान शिव की कठोर तपस्या कर तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने का वरदान प्राप्त कर लिया। उसके बाद देवताओं पर कामासुर का अत्याचार बहुत अधिक बढ़ने लगा।और उस वक्त सभी देवताओं ने मिलकर इस संकट को हरने के लिए भगवान गणेश की अराधना की।तब श्री गणेश भगवान विकट रूप लेकर कामासुर का अन्त किया। विकट रूप में भगवान गणेश का वाहन एक मोर था।

  • विघ्नराज

विघ्नराज– यह गणेश भगवान का सातवां अवतार माना जाता है। एक बार माता पार्वती अपनी सखियों के साथ बेहद जोर से हंसी, उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। पार्वती ने उसका नाम मम रखा, उसके बाद मम वन में तपस्या के लिए चला गया। मम ने गणपति को प्रसन्न कर  वरदान के रूप में ब्रह्माण्ड पर राज मांगा। उसके बाद शम्बरसुर नें मम से अपनी पुत्री मोहनी से ब्याह कर दिया और शुक्राचार्य ने मम को दैत्यराज के सिंहासन पर बिठा दिया। उसके बाद जगत में ममासुर के अत्याचार बढ़ गए और सारे देवी-देवताओं को कारागार में डाल दिया। तब देवताओं ने भगवान गणेश की भक्ति की। तब गणपति ने विघ्नराज का रूप धारण कर ममासुर का संहार कर देवताओं की रक्षा की।

  • धूम्रवर्ण

धूम्रवर्ण– एक बार सूर्य देव को घमंड आ गया। तब सूर्य देव को एक छींक आई और उस छींक से एक दैत्य का जन्म हुआ, जिसका नाम अहम था। उस दैत्य ने भी गुरू शुक्राचार्य से शिक्षा प्राप्त की। और गणेश भगवान की घोर तपस्या कर महाशक्तिशाली बन गया, बाद में उसका नाम अंहतासुर पड़ गया। जब वह क्रुर और अत्याचारी दैत्य बन गया , तब भगवान गणेश धूम्रवर्ण अवतार में प्रकृट हुए और अहंतासुर का वध किया। इस अवतार में गणेश जी का रंग धुए जैसा और शरीर में आग की ज्वालाएं फूट रही थी।

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